है लक्ष्य यह अतुल्य सा,
अप्राप्य सा सुरम्य सा।
है पथ कठिन विषम जटिल,
असाध्य सा अगम्य सा।
स्वरक्त को तू चख चुका,
तू सह चुका तू थक चुका।
अग्नि में समाज की,
तू जल चुका धधक चुका।
पर युद्ध अभी शेष है,
वेह लक्ष्य अभी शेष है।
की चेतना में वीर की,
परब्रह्म का परिवेश है।
तू सिंह सा दहाड़ अब,
तू शत्रु को ललकार अब।
कर मेघ सी तू गर्जना,
तू कण नहीं पहाड़ अब।
है लक्ष्य तू है पथ भी तू,
है ब्रह्म तू परब्रह्म तू।
उठ खडा जो तू हुआ,
हर ग्रन्थ का है जन्म तू।
2 comments:
kya baat kya baat !
zade bhul na jana .... sabki cgs shift kar sakte ho tum
[could not get better means to says " sabki maa **** sakte ho]
:) shukriya dost
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